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भारतीय समाज एक परिचय

भारतीय समाज एक परिचय

भारतीय समाज  परिचय

भारतीय समाज एक परिचय

बहुविकल्पीय प्रश्न 
प्रश्न 1 भारतीय संस्कृति के प्रमुख लक्षण निम्न में से कौन हैं ?
( अ ) प्राचीनता ( ब ) दीर्घजीविता
( स ) सहिष्णुता ( द ) उक्त सभी

प्रश्न 2 . भारतीय संस्कृति के प्रमुख आधार निम्न में से कौन हैं ?
( अ ) संयुक्त परिवार व्यवस्था ( ब ) आश्रम व्यवस्था
( स ) वर्ण व्यवस्था ( द ) उक्त सभी

प्रश्न 3 . निम्न में से कौन समकालीन भारतीय समाज की विशेषताएँ हैं ?
( अ ) जीवन – व्यवहार में परिवर्तन ( ब ) भौतिकवादी जीवन
(स ) बदलता स हुआ सामाजिक स्तरीकरण ( द ) सभी

प्रश्न 4. ‘ वसुधैव कुटुम्बकम् ‘ किस देश की अवधारणा है ?

( अ ) श्रीलंका ( ब ) नेपाल
( स ) भूटान ( द ) भारत

प्रश्न 5 . निम्न में से कौन धर्म का स्वरूप नहीं है ?
( अ ) वर्ण धर्म ( ब ) आश्रम धर्म
( स ) कुल धर्म ( द ) पर धर्म

प्रश्न 6. मनुस्मृति में किस यज्ञ का उल्लेख नहीं है ?
( अ ) ब्रह्म यज्ञ ( ब ) पितृ यज्ञ
( स ) मातृ यज्ञ ( द ) नृयज्ञ

प्रश्न 7 . निम्न में से कौन वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति का सिद्धांत नहीं है ?
( अ ) परंपरागत सिद्धान्त ( ब ) रंग का सिद्धान्त
( स ) कर्म तथा धर्म का सिद्धान्त ( द ) मृत्यु का सिद्धान्त

अति लघु उत्तरीय

प्रश्न 1 . स्ववाचन किसे कहते हैं ?
उत्तर- गहनतापूर्वक स्वयं का आत्मनिरीक्षण करने की योग्यता को स्ववाचन कहते हैं ।

प्रश्न 2. ‘ समुदाय ‘ से क्या आशय है ?
उत्तर- समुदाय से तात्पर्य परिवार , रिश्तेदार , जाति , कुल , भाषा , क्षेत्र अथवा धर्म के आधार पर सम्बन्ध से है ।

प्रश्न 3 . ‘ आरोपित पहचान ‘ क्या है ?
उत्तर- निपुणता एवं योग्यता से इतर किसी व्यक्ति की जन्म तथा सम्बन्धों के आधार पर पहचान को आरोपित पहचान कहते हैं ।

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प्रश्न 4. संस्कृति से क्या आशय है ?
उत्तर- समाज का सुशिक्षित तथा प्रतीकात्मक पक्ष जिसमें भाषा, रीति रिवाज , परंपरा इत्यादि शामिल होते हैं तथा जिसका संचरण पीढ़ी दर पीढ़ी होता है, संस्कृति कहते हैं ।

प्रश्न 5 . ‘ समाज ‘ किसे कहते हैं ?
उत्तर- समाज ऐसे लोगों का समूह है , जो समान संस्कृति का सहभाजन करते हैं , एक विशेष प्रादेशिक क्षेत्र रखते हैं तथा जिनका एक पृथक् एकीकृत अस्तित्व होता है ।

प्रश्न 6. एकीकरण क्या है ?
उत्तर- एक ऐसी प्रक्रिया जिसके अंतर्गत समाज की विभिन्न इकाइयाँ एकताबद्ध होती हैं अर्थात् एक दूसरे के साथ मिलकर एकसूत्र में बँध जाती हैं ।

लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. आत्मसात्मीकरण क्या है ?
उत्तर – आत्मसात्मीकरण सांस्कृतिक एकीकरण और समजातीयता की एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा नए शामिल हुए या अधीनस्थ समूह अपनी विशिष्ट संस्कृति को खो देते हैं तथा प्रभुत्वशाली बहुसंख्यकों की संस्कृति को अपना लेते हैं । आत्मसात्मीकरण बलपूर्वक भी करवाया जा सकता है और यह ऐच्छिक भी हो सकता है । सामान्यतः यह अधूरा होता है , जहाँ अधीनस्थ या शामिल होने वाले समूह को समान शर्तों पर पूर्ण सदस्यता प्रदान नहीं की जाती। उदाहरण के लिए बहुसंख्यकों द्वारा एक प्रवासी समुदाय के साथ भेदभाव करना और परस्पर विवाह की अनुमति नहीं देना ।

One Word Substitution

प्रश्न 2. समाजशास्त्र के अध्ययन के प्रथम चरण में प्रमुख रूप से क्या शामिल है ?
उत्तर – समाजशास्त्र के अध्ययन के प्रथम चरण में मुख्य रूप से पूर्वधारणाओं को विलोपित करना ही शामिल है । समाज के बारे में पहले से प्राप्त हमारा ज्ञान सामाजिक समूहों तथा हमें प्राप्त सामाजिक वातावरण पर आधारित है जो किसी खास वैचारिक प्रवृत्तियों से प्राप्त हो सकता है । हमारे विचार , हमारी सैद्धांतिक प्राप्तियाँ , सामाजिक सम्बन्धों के बारे में हमारे आग्रह ‘ समाजीकृत ‘ होने की प्रक्रिया में हमें प्राप्त हुए हैं । सामाजिक सन्दर्भो से व्यक्ति आस्था तथा अपेक्षाओं को प्राप्त करता है । यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति की आस्था तथा अपेक्षा गलत तथा निरर्थक हों किन्तु यह प्राय : अधूरा तथा पूर्वाग्रह युक्त होता है । अनुभवजन्य तथा सहज बोध से प्राप्त ज्ञान की सीमा होती है और यह ‘ सामाजिक वास्तविकता ‘ के एक अंग के रूप में हमें प्राप्त होता है जो सामाजिक समूहों के हितों एवं विचारों की ओर अधिक झुका होता है।

प्रश्न 3. विशिष्ट भारतीय चेतना ने कब जन्म लिया ?
उत्तर- ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के दौर से ही विशिष्ट भारतीय चेतना ने जन्म लिया । इस दौर में भारत ने आजादी प्राप्त की तथा आधुनिकीकरण की सशक्त प्रवृत्तियों की ओर कदम बढ़ाया । देश के राजनीतिक एकीकरण के साथ पूँजीवादी आर्थिक परिवर्तन ने भारत को नई प्रवृत्तियों से परिचित कराया । परिवर्तन के विरोध में जाना सम्भव नहीं है । समाज को पुराने ढर्रे पर ले जाना सम्भव नहीं है । समाज कभी भी पुराने विचारों की ओर नहीं जाता , जब उसने नवीन पद्धतियों को ग्रहण कर लिया हो । ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लम्बे संघर्ष के बाद भारत को आर्थिक , राजनीतिक तथा प्रशासनिक एकीकरण की उपलब्धि प्राप्त हुई । औपनिवेशिक शासन के शोषण के चिह्न आज भी भारतीय समाज में मौजूद हैं । साम्राज्यवादी युग का यह ऑथोडॉक्स ( विपरीत विचार ) सामने है जिसने ‘ राष्ट्रवाद ‘ को जन्म दिया और यही राष्ट्रवादी चेतना उपनिवेशवाद का शत्रु बना।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारतीय समाज का संक्षेप में परिचय प्रस्तुत कीजिए ।
उत्तर – भारतीय समाज का परिचय औपनिवेशिक दौर में ही एक विशिष्ट भारतीय चेतना ने जन्म लिया । औपनिवेशिक शासन ने पहली बार भारत को एकीकृत किया एवं पूंजीवादी आर्थिक परिवर्तन एवं आधुनिकीकरण की शक्तिशाली प्रक्रियाओं से भारत का परिचय कराया । एक तरह से जो परिवर्तन लाए गए उन्हें पलटा नहीं जा सकता था क्योंकि समाज वैसा कभी नहीं हो सकता जैसा पहले था । औपनिवेशिक शासन के अन्तर्गत भारत को आर्थिक , राजनीतिक एवं प्रशासनिक एकीकरण की उपलब्धि की भारी कीमत चुकानी पड़ी । औपनिवेशिक शोषण एवं प्रभुत्व द्वारा दिए गए अनेक प्रकार के घावों के निशान भारतीय समाज पर आज भी मौजूद हैं । लेकिन उस युग का एक विरोधाभासी सच यह है कि उपनिवेशवाद ने ही अपने शत्रु राष्ट्रवाद को जन्म दिया ।

ऐतिहासिक रूप से भारतीय राष्ट्रवाद ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के अंतर्गत आकार लिया । औपनिवेशिक प्रभुत्व के सम्मिलित अनुभवों ने समुदाय के विभिन्न भागों को एकीकृत करने एवं शक्तिशाली बनाने में सहायता की । पाश्चात्य शैली की शिक्षा के माध्यम से उभरते मध्य वर्ग ने उपनिवेशवाद को उसकीअपनी मान्यताओं के आधार पर ही चुनौती दी । यह हमारे इतिहास की विडम्बना ही है कि उपनिवेशवाद एवं पाश्चात्य शिक्षा ने ही परंपरा की पुनः खोज को प्रोत्साहन प्रदान किया । इसके प्रभावस्वरूप अनेक तरह की सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियाँ विकसित हुईं जिससे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तरों पर समुदाय के नवोदित रूप सुदृढ़ हुए हैं । उपनिवेशवाद ने नए वर्गों एवं समुदायों का जन्म दिया जिन्होंने बाद के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । नगरीय मध्य वर्ग राष्ट्रवाद के प्रमुख वाहक थे एवं उन्होंने स्वतंत्रता – प्राप्ति के अभियान की अगुवाई की । औपनिवेशिक हस्तक्षेपों ने भी धार्मिक एवं जाति आधारित समुदायों को निश्चित रूप दिया । इन्होंने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

समाजशास्त्र एक ऐसा विषय है , जिसके द्वारा कोई समाज के बारे में कुछ जानता है । अन्य विषयों की शिक्षा हमें घर , विद्यालय या अन्य स्थानों पर निर्देशों के द्वारा प्राप्त होती है , किंतु समाज के बारे में हमारा अधिकतर ज्ञान बिना किसी सुस्पष्ट शिक्षा के अर्जित होता है । समय के साथ बढ़ने वाला यह एक अभिन्न अंग की तरह है , जो स्वाभाविक तथा स्वतः स्फूर्त तरीके से प्राप्त होता है । समाजशास्त्रियों तथा सामाजिक मानवविज्ञानियों ने शब्द ( कार्य ) को जीवविज्ञान से लिया है , जहाँ इसका प्रयोग कुछ निश्चित जैविक प्रक्रियाओं के लिए शारीरिक रचना के रख – रखाव हेतु किया जाता था । किसी भी समाज की निरंतरता तथा अस्तित्व को बनाए रखने के लिए निम्नलिखित कार्य आवश्यक हैं –
( i ) सदस्यों की नियुक्ति
( ii ) विशेषज्ञता
( iii ) सेवाओं का उत्पादन तथा वितरण
( iv ) आदेश का पालन

एक सामाजिक संरचना में निम्न शामिल होते हैं –
( i ) महिला तथा पुरुष , वयस्क तथा बच्चे , विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक तथा धार्मिक समूह इत्यादि ।
( ii ) माता – पिता , बच्चों तथा विभिन्न समूहों के बीच अंतर्संबंध ।
( iii ) अंत में , समाज के सभी अंग मिलते हैं तथा व्यवस्था अंतर्संबंधित तथा पूरक अवधारणा बन जाती है ।

समुदाय हमें भाषागत तथा सांस्कृतिक मूल्य सिखाता है , जिसके द्वारा हम विश्व को समझते हैं । यह जन्म तथा संबंधों पर आधारित होता है , न कि अर्जित योग्यता अथवा निपुणता पर । जन्म – आधारित पहचान को आरोपित कहा जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति विशेष की पसंदों का कोई महत्त्व नहीं होता । यह वस्तुतः निरर्थक तथा विभेदात्मक है । आरोपित पहचान से पीछा छुड़ाना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि बिना विचार किए उन्हें त्यागने पर अन्य संबंधियों की पहचान के आधार पर हमें चिह्नित किया जाएगा । इस प्रकार की आरोपित पहचान आत्म – निरीक्षण के लिए बहुत ही हतोत्साहित करने वाली है । समुदाय के विस्तारित तथा अतिव्यापी समूहों के संबंध ; जैसे – परिवार , रिश्तेदारी , जाति , नस्ल , भाषा , क्षेत्र , अपना धर्म विश्व को अपनी पहचान बताता है तथा स्वयं की पहचान की चेतना पैदा करता है कि हम क्या हैं ।

हिंदी पद्य से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न

प्रश्न 2. समाजशास्त्र का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध बताइए ।
उत्तर – समाजशास्त्र का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध समाजशास्त्र का अन्य सामाजिक विज्ञानों से सम्बन्ध इस प्रकार है –
1. समाजशास्त्र एक ऐसा विषय है , जिसमें कोई भी शून्य से प्रारंभ नहीं होता , क्योंकि हर किसी को समाज के बारे में जानकारी होती है , जबकि अन्य विषय विद्यालयों , घरों तथा अन्य जगहों पर पढ़ाए जाते हैं ।
2. चूँकि जीवन के बढ़ते हुए क्रम में यह एक अभिन्न हिस्सा होता है , इसलिए समाज के बारे में किसी को जानकारी स्वतः स्फूर्त तथा स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो जाती है । दूसरे विषयों के संबंध में छात्रों से इस प्रकार के पूर्व ज्ञान की अपेक्षा नहीं होती ।
3. इसका अर्थ यह हुआ कि हम उस समाज के विषय में बहुत कुछ जानते हैं , जिसमें हम रहते तथा अंतर्किया करते हैं । जहाँ तक दूसरे विषयों का संबंध है , इसमें छात्रों की पूर्व जानकारी नगण्य होती है ।
4. यद्यपि इस प्रकार की पूर्व जानकारी अथवा समाज के साथ प्रगाढ़ता का समाजशास्त्र में लाभ तथा हानि दोनों ही है । पूर्ण जानकारी के अभाव में दूसरे विषयों के सम्बन्ध में लाभ अथवा हानि का प्रश्न ही नहीं उठता ।

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