संक्रामक रोग प्रसार तथा नियंत्रण

संक्रामक रोग प्रसार तथा नियंत्रण

संक्रामक रोग प्रसार तथा नियंत्रण

संक्रामक रोग प्रसार तथा नियंत्रण

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1. संक्रामक रोगों का संक्रमण किनके द्वारा होता है ?
( a ) वायु द्वारा ( b ) भोजन तथा जल द्वारा
( c ) कीटों द्वारा ( d ) ये सभी

प्रश्न 2. संक्रामक रोगों से बचाव के उपाय हैं
( a ) पृथक करना ( b ) विसंक्रमण
( c ) टीका लगवाना ( d ) ये सभी

प्रश्न 3. डी.पी.टी. का टीका किन – किन रोगों की रोकथाम के लिए लगाया
( a ) सिर दर्द ( b ) पैर में सूजन
( c ) डिफ्थीरिया , कुकुर खाँसी , टिटनेस ( d ) आँख दुखना

प्रश्न 4. शरीर की रोगों से संघर्ष करने की शक्ति को कहते हैं ?
( a ) नि : संक्रमण ( b ) रोग – प्रतिरोधक क्षमता

( c ) उद्भवन अवधि ( d ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 5. निम्नलिखित में से कौन – सा पदार्थ रासायनिक नि : संक्रामक नहीं है ?
( a ) चूना ( b ) ब्लीचिंग पाउडर
( c ) पोटैशियम परमैंगनेट ( d ) जलाना

प्रश्न 6. ठोस नि : संक्रामक है
( a ) फिनायल ( b ) फार्मेलीन
( c ) डी.डी.टी. ( d ) चूना

प्रश्न 7. छोटी माता का रोगाणु कारक है
( a ) वायरस   ( b ) जीवाणु
( c ) प्रोटोजोआ ( d ) इनमें से कोई नहीं

प्रश्न 8. किस जीवाणु द्वारा क्षय रोग फैलता है ?

( a ) क्यूलेक्स ( b ) बैसिलस
( c ) वायरस ( d ) अमीबा

प्रश्न 9. मक्खियों द्वारा कौन – सा रोग फैलता है ?
( a ) चेचक ( b ) हैजा
( c ) टायफाइड ( d ) मलेरिया

प्रश्न 10. मलेरिया रोग फैलता है
( a ) चूहे द्वारा ( b ) मच्छर द्वारा
( c ) मक्खी द्वारा ( d ) तिलचट्टा द्वारा

प्रश्न 11. टायफाइड रोगी को रोग के पश्चात् किस प्रकार का भोजन देना चाहिए ?
( a ) तरल ( b ) अर्द्धतरल आहार
( c ) सामान्य आहार ( d ) ये सभी

प्रश्न 12. हैजा के जीवाणु का नाम है ?
( a ) वायरस ( b ) विब्रियो कॉलेरी
( c ) कोमा बैसिलस ( d ) साल्मोनेका टाइफी

प्रश्न 13. कौन – सा रोग दूषित जल से फैलता है ?

(a) हैजा ( b ) मियादी बुखार
( c ) अतिसार ( d ) ये सभी

प्रश्न 14. रेबीज किस जानवर के काटने से होता है ?
( a ) कुत्ता ( b )बिल्ली
( c ) मच्छर ( d ) हाथी

प्रश्न 15. रेबीज रोग का कौन – सा लक्षण है ?
( a ) उल्टी होना ( b ) पानी से डरना
( c ) दस्त होना ( d ) जाड़े से काँपना

प्रश्न 16. प्लेग रोग फैलता है
( a ) चूहे द्वारा ( b ) मच्छर द्वारा
( c ) मक्खी द्वारा ( d ) तिलचट्टे द्वारा

प्रश्न 17. निम्न में से कौन – सा हिपेटाइटिस सर्वाधिक खतरनाक होता है ?
( a ) B ( b ) C
( c ) D ( d ) G

प्रश्न 18. डेंगू किस मच्छर के काटने से होता हैं ?
( a ) एडीज इजिप्टी ( b ) क्यूलेक्स
( c ) एनाफ्लीज ( d ) मैनसोनिया

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 19. संक्रामक रोग क्या हैं ?
उत्तर – विभिन्न रोगाणुओं ( जीवाणु , विषाणु , कवक तथा प्रोटोजोआ आदि ) के कारण होने वाले रोग ‘ संक्रामक रोग ‘ कहलाते हैं ।

प्रश्न 20. संक्रामक रोगों की उद्भवन अवधि से क्या आशय है ?
उत्तर – शरीर में रोगाणुओं के प्रवेश तथा रोग के लक्षण प्रकट होने के मध्य जो अन्तराल होता है , उसे रोग की उद्भवन अवधि अथवा सम्प्राप्ति काल कहते हैं ।

मानव भूगोल प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

प्रश्न 21. संक्रामक रोग किन – किन माध्यमों द्वारा फैलते हैं ?
उत्तर – संक्रामक रोग जल एवं भोजन , वायु , रोगवाहक कीटों , चोट अथवा घाव , रोगी के प्रत्यक्ष सम्पर्क अथवा जननेन्द्रिया द्वारा के माध्यम से फैलते हैं।

प्रश्न 22. किन्हीं पाँच संक्रामक रोगों के नाम बताइए

उत्तर – क्षय रोग , हैजा , टाइफाइड , अतिसार , रेबीज आदि संक्रामक रोग हैं ।

प्रश्न 23. जल द्वारा संवाहित होने वाले रोग कौन – कौन – से हैं ?
उत्तर – जल के माध्यम से फैलने वाले मुख्य रोग हैं – टायफाइड , हैजा , अतिसार पेचिश , पीलिया आदि ।

प्रश्न 24. निःसंक्रमण एवं निःसंक्रामक शब्दों का अर्थ स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर – रोगाणुओं को नष्ट करने की प्रक्रिया को ‘ नि : संक्रमण ‘ कहते हैं । नि : संक्रमण के लिए अपनाए जाने वाले पदार्थों को ‘ नि : संक्रामक ‘ कहा जाता है ।

प्रश्न 25. जीवाणुओं द्वारा फैलने वाले दो रोगों के नाम लिखिए
उत्तर – जीवाणुओं द्वारा फैलने वाले रोग हैं – हैजा , क्षय रोग , अतिसार , प्लेग आदि ।

प्रश्न 26. क्षय रोग का कारण लिखिए ।
उत्तर – क्षय रोग माइक्रोबैसिलस ट्यूबरकुलोसिस नामक जीवाणु के संक्रमण के कारण होता है ।

प्रश्न 27. बी.सी.जी. का टीका किस रोग की रोकथाम के लिए लगाया जाता है ?
उत्तर – बी.सी.जी. का टीका क्षय रोग ( टी . बी . ) की रोकथाम के लिए लगाया जाता है ।

Class 12 हिंदी गद्य के विकास पर आधारित प्रश्न

प्रश्न 28. मलेरिया रोग का कारण लिखिए ।
उत्तर – मलेरिया नामक रोग ‘ प्लाज्मोडियम ‘ नामक परजीवी प्रोटोजोआ के कारण होता है । इसका संक्रमण मादा ऐनाफ्लीज मच्छर के माध्यम से होता है ।

प्रश्न 29. मलेरिया रोग में किस प्रकार का भोजन देना चाहिए ?
उत्तर – मलेरिया रोग में हल्का , सुपाच्य तथा पर्याप्त कैलोरीयुक्त भोजन देना चाहिए ।

प्रश्न 30. पागल कुत्ते के काटने से उत्पन्न रोग के दो लक्षण लिखिए ।
उत्तर – पागल कुत्ते के काटने से उत्पन्न रोग ( हाइड्रोफोबिया ) के लक्षण हैं –

(i) तीव्र सिरदर्द , तीव्र ज्वर तथा गले एवं छाती की पेशियों के संकुचन से पीड़ा होती है ।

(ii) गले की नलियों के अवरुद्ध होने से तरल आहार ग्रहण करने में कठिनाई तथा रोगी को जल से भय लगता है ।

प्रश्न 31. कुत्ते के काटने के दो प्राथमिक उपचार लिखिए ।
उत्तर – कुत्ते के काटने के दो प्राथमिक उपचार हैं –

(i) कटे हुए स्थान को कार्बोलिक साबुन एवं स्वच्छ जल से भली प्रकार धोएँ ।

(ii) एण्टीसेप्टिक औषधि का लेप लगाएँ ।

प्रश्न 32. अतिसार के रोगी को कैसा भोजन देना चाहिए ?
उत्तर – अतिसार के रोगी को तरल , हल्का एवं सुपाच्य भोजन देना चाहिए ।

प्रश्न 33. जोड़ों में दर्द एवं लसीका वाहिनियों में सूजन किन – किन रोगों के प्रमुख लक्षण है ?
उत्तर – जोड़ों में दर्द एवं लसीका वाहिनियों में सूजन क्रमश : डेंगू एवं हाथीपाँव रोग के लक्षण हैं ।

प्रश्न 34. चिकनगुनिया का कोई एक लक्षण लिखिए ।
उत्तर – चिकनगुनिया में तीन ज्वर सिर , जोड़ों एवं मांसपेशियों में दर्द , कमजोरी आना आदि मुख्य लक्षण हैं ।

पोषण एवं संतुलित आहार

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 35. संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय क्या हैं ?
उत्तर – सक्रामक रोगों के उपचार की तुलना मे नियन्त्रण एवं बचाव के उपाय अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं , क्योंकि संक्रामक इसकी रोगों का प्रसार एक साथ सभी व्यक्तियों को प्रभावित करता है । इसके अतिरिक्त इसकी रोकथाम के उपायों का व्यापक स्तर पर होना भी अतिआवश्यक है ।

संक्रामक रोगों की रोकथाम के सामान्य उपाय – संक्रामक रोगों की रोकथाम के कुछ सामान्य उपाय निम्नलिखित है –
1. स्वास्थ्य विभाग को सूचित करना किसी भी व्यक्ति को संक्रामक रोग होने की स्थिति में उसकी सूचना निकट के स्वास्थ्य अधिकारी अथवा चिकित्सक को अवश्य देनी चाहिए जिससे समय रहते रोग के प्रसार को रोका जा सके
2. रोगग्रस्त ( संक्रमित) व्यक्ति को अलग रखना संक्रामक रोगों को फैरने से रोकने के लिए विशेषकर वायुवाहित ( एयर – बॉर्न ) रोगों के मामले में , संक्रमित व्यक्तियों के उपचार की अलग से विशेष व्यवस्था की जानी चाहिए , जिससे रोगी का समुचित उपचार भी हो जाए एवं अन्य स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमण से बच जाए ।
3. रोग – प्रतिरक्षा के उपाय संक्रामक रोगों की रोकथाम का महत्त्वपूर्ण उपाय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करना है । नियमित रूप से शुद्ध जन एवं पौष्टिक भोजन का सेवन , विभिन्न रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है । वर्तमान में विभिन्न संक्रामक रोगों से बचने तथा रोग प्रतिरक्षा शक्ति के विकास हेतु टीके भी उपलब्ध है

प्रश्न 36. रोग – प्रतिरोधक क्षमता से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर – रोग – प्रतिरोधक क्षमता हमारा शरीर अधिकांश बाह्य कारकों से स्वयं अपनी रक्षा कर लेता है । शरीर की विभिन्न रोगकारक जीवों से लड़ने की क्षमता , जो उसे प्रतिरक्षी – तन्त्र के कारण मिली है , ‘ रोग – प्रतिरोधक क्षमता कहलाती है । रोग – प्रतिरोधक क्षमता दो प्रकार की होती है ।
1. सहज प्रतिरक्षा – सहज प्रतिरक्षा एक प्रकार की अविशिष्ट रक्षा है , जो जन्म के समय से ही मौजूद होती है । वस्तुत : हमारे शरीर में सभी प्रकार के संक्रमणों के विरुद्ध कुछ अवरोध ( बैरियर ) कार्य करते है , इन्हें ‘ अविशिष्ट प्रतिरक्षी तन्त्र कहते हैं । ये अवरोध चार प्रकार होते है –
( i ) शारीरिक अवरोध – शरीर पर त्वचा मुख्य अवरोध है . जो बाहर से रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है ।
( ii ) कायिकीय अवरोध- आमाशय में अम्ल , मुँह में लार , आँखों के आँसू ये सभी रोगाणुओं की वृद्धि को रोकते हैं ।
( iii ) कोशिकीय अवरोध- रक्त में उपस्थित श्वेत रुधि कणिकाएँ , न्यूट्रोफिल्स एवं मोनोसाइट्स रोगाणुओं का भक्षण करती हैं ।
( iv ) साइटोकाइन अवरोध – विषाणु संक्रमित कोशिकाएँ इण्टरफेरॉन नामक प्रोटीनों का स्रावण करती है , जो असंक्रमित कोशिकाओं को और आगे विषाणु संक्रमण से बचाती है ।
2. उपार्जित प्रतिरक्षा – उपार्जित प्रतिरक्षा रोगजनक विशिष्ट रक्षा है । हमारे शरीर का जब पहली बार किसी रोगजनक ( रोगाणु ) से सामना होता है , तो शरीर निम्न तीव्रता की प्राथमिक अनुक्रिया ( रेस्पॉन्स ) करता है । बाद में उसी रोग से सामना होने पर बहुत ही उच्च तीव्रता की द्वितीय अनुक्रिया होती है।
उपार्जित प्रतिरक्षा भी दो प्रकार की होती है –
( i ) सक्रिय प्रतिरक्षण – हमारे शरीर के रक्त में मौजूद दो विशेष प्रकार के लसीकाणु प्रतिरक्षी अनुक्रियाएँ करते हैं । ये हैं – बी लसीकाणु और टी – लसीकाणु । बी – लसीकाणु हमारे शरीर में एण्टीबॉडीज उत्पन्न करते हैं , जबकि टी – लसीकाणु एण्टीबॉडीज उत्पन्न करने में बी – कोशिकाओं की सहायता करती है ।
( ii ) निष्क्रिय प्रतिरक्षण – जब शरीर की रक्षा के लिए बने – बनाए प्रतिरक्षी ( एण्टीबॉडीज ) सीधे ही शरीर को दिए जाते हैं , तो यह निष्क्रिय प्रतिरक्षा कहलाती है ।

प्रश्न 37. हेपेटाइटिस ‘ बी ‘ क्यों होता है ? इसके रोकथाम के उपाय का वर्णन करें ।
उत्तर – हिपेटाइटिस एक गम्भीर रोग है , जिसे सामान्यता ‘ पीलिया ‘ कहा जाता है । हिपटाइटिस विभिन्न विषाणुओं द्वारा यकृत में फैलता है , जो भोजन व गन्दे जल द्वारा शरीर में संचरित होता है । हिपेटाइटिस- B इसका सबसे घातक प्रकार है । यह संक्रमित रक्ताधान , लैंगिक सम्पर्क तथा संक्रमित व्यक्ति के कपड़ों के प्रयोग द्वारा भी हो सकता है । लक्षण इस रोग में यकृत काम करना बन्द कर देता है , जिससे पित्त वर्णक शरीर में जमा होने लगते है और शरीर का रंग पीला हो जाता हैं । उपापचय दर कम हो जाने से भूख नहीं लगती तथा जी – मिचलाने लगता है ।
हिपेटाइटिस B के लक्षण –
( i ) ज्वर , अरुचि तथा मतली आना
( ii ) यकृत के संक्रमण से भोजन ना पचना
( iii ) सन्धियों एवं पेशियों में दर्द रहना
( iv ) त्वचा एवं मूत्र का पीला होना आदि हिपेटाइटिस B के रोकथाम के उपाय हिपेटाइटिस B के रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय किए गए हैं
( i ) हमेशा साफ व उबला भोजन करें ।
( ii ) भोजन करते समय साफसफाई का भी ध्यान रखें । आदि हैं।

प्रश्न 38. प्लेग रोग पर टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर – प्लेग कारण एवं प्रसार- यह रोग पाश्च्यूरेला पेस्टिस नामक जीवाणु से होता है । इसका संक्रमण चूहों पर पाए जाने वाले पिस्सुओं से होता है । प्लेग के जीवाणु पिस्सुओं के माध्यम से चूहों को संक्रमित करते हैं , जिससे चूहे मरने लगते हैं । तत्पश्चात् पिस्सुओं द्वारा मनुष्यों को काटने पर , ये जीवाणु व्यक्ति के रक्त परिसंचरण में शामिल हो जाते हैं एवं व्यक्ति को रोगग्रस्त कर देते हैं । इसके बाद व्यक्ति से व्यक्ति में संक्रमित होने वाला यह रोग महामारी का रूप धारण कर लेता है ।
लक्षण इस रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –
1. प्लेग के विषाणु के आक्रमण के प्रारम्भ में ही व्यक्ति अति तीव्र ज्वर ( 107 ° F तक ) से ग्रस्त हो जाता है ।
2. व्यक्ति की आँखें लाल हो जाती हैं एवं अन्दर धंसती हुई प्रतीत होती हैं ।
3. कभी – कभी रोगी को दस्त तथा . कमजोरी भी होने लगती है ।
4. रोगी की दशा गम्भीर होने पर उसकी बगल तथा जाँघों में कुछ गिल्टियाँ निकल आती हैं । इस दशा में उसकी मृत्यु भी हो सकती है ।
बचाव के उपाय – इस रोग से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते है –
1. इस रोग से बचाव के लिए घर तथा सार्वजनिक स्थलों को स्वच्छ रखना अत्यन्त आवश्यक है ।
2. विषाणु से संक्रमित क्षेत्र में चूहों को समाप्त करके भी महामारी के प्रकोप को नियन्त्रित किया जा सकता है ।
3. प्लेग के प्रकोप के दिनों में नंगे पैर नहीं रहना चाहिए इससे रोगवाहक कीटो के काटने की सम्भावना बढ़ जाती है ।
4. प्लेग का टीका लगवाना भी अनिवार्य है । उपचार प्लेग के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को तुरन्त अस्पताल में भर्ती कर देना चाहिये।

प्रश्न 39. पेचिश एवं अतिसार में क्या अन्तर है ?

उत्तर – पेचिश एवं अतिसार दोनों ही पाचन तन्त्र से सम्बन्धित संक्रामक रोग है । दूषित पेय जल एवं भोजन , संक्रमण के प्रमुख स्रोत हैं । घरेलू मक्खियाँ इन रोगों को फैलाने में रोगवाहक का कार्य करती हैं ।

प्रश्न 40. मलेरिया रोगी को किस प्रकार का भोजना देना चाहिए ?
उत्तर – मलेरिया मच्छर द्वारा फैलने वाली संक्रामक रोग है । गर्म देशों तथा नमी वाले क्षेत्रों में इसका प्रकोप अधिक होता है । मलेरिया का कारक प्लाज्मोडियम नामक परजीवी प्रोटोजोआ है । यह रोगवाहक मादा ऐनाफ्लीज मच्छर के काटने होता है , जो मनुष्य का खून चूसती है । मलेरिया से पीड़ित व्यक्ति के उपचार लिए कुनैन नामक औषधि का प्रयोग किया जाता है । मलेरिया के रोगी को विश्राम एवं हल्का व सुपाच्य भोजन दिया जाना चाहिए ।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

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प्रश्न 41. फाइलेरिया ( हाथी पाँव ) रोग के क्या कारण तथा लक्षण हैं ? इसके बचाव के उपाय लिखिए ।
उत्तर – फाइलेरिया एक परजीवी जन्य संक्रामक बीमारी है , जो धागे जैसे कृमियों से होती है । इसे एक उपेक्षित उष्ण कटिबन्धीय बीमारी माना जाता है। यह विश्व में उष्ण कटिबन्धीय और उपोष्ण कटिबन्धीय देशों में एक गम्भीर स्वास्थ्य समस्या है । विश्व में लगभग 1.3 अरब लोगों को इस बीमारी के संक्रमण का खतरा है । जिसमें 4 करोड़ लोग इस बीमारी के कारण किसी विकृति का शिकार हो गए हैं या अक्षम हो चुके हैं । इसमें लोगों के पैर में सूजन हो जाती है , जो इसका एक सामान्य लक्षण पाया जाता है । अत : इसे हाथी पाँव के नाम से भी जाना जाता है ।
• कृमि द्वारा उत्तकों को नुकसान पहुंचने से लसिका द्रव का बहाव बाधित होना , जिससे शरीर में सूजन , घाव और संक्रमण के प्रभाव दिखना । •शारीरिक कमजोरी , सिरदर्द , हल्के बुखार और बार – बार खुजली का शरीर में प्रभाव दिखना । •बुखार , लसीका तन्त्र में गम्भीर सूजन और फेफड़ों की बीमारी भी प्रमुख लक्षण को प्रदर्शित करती है ।
• साँस लेने में परेशानी , घबराहट , मूत्र का रंग दूधियाँ होना , जनन अंगों में सूजन का होना आदि।
फाइलेरिया के कारण –
•फाइलेरिया परजीवी जन्य रोग है , जो फाइलेरियोडिडिया कुल के नेमैटोडो ( गोलकृमि ) के संक्रमण से होता है । इस प्रकार यह मच्छरों से फैलता है , जो . परजीवी कृमियों के लिए रोग वाहक का काम करते हैं । कृमि प्रभावित क्षेत्रों से बाहर जाने वाले रोग स्वच्छता की कमी के कारण दूसरे को प्रभावित करते हैं ।
• संक्रमण के बाद कृमि के लार्वा संक्रमित व्यक्ति के रक्त धारा में बहते रहता है जबकि वयस्क कृमि मानव लसीका तन्त्र में जगह बना लेता है । जिसे संक्रमण प्रभावी हो जाता है और व्यक्ति के शरीर में सूजन जैसी बीमारी हो जाती है , जो फाइलेरिया कहलाती है ।
फाइलेरिया के लक्षण – मच्छर के काटने के पश्चात् शरीर के किसी अंग में सूजन का प्रभाव दिखाई पड़ना ।
फाइलेरिया के बचाव के उपाय –
फाइलेरिया के बचाव या नियन्त्रण के प्रमुख उपाय निम्न हैं –
• हाथी पाँव रोग विशेषकर नंगे पाँव चलने वालों को होता है , इसलिए जूते , चप्पल का उपयोग कर इस संक्रमण से बचा जा सकता है ।
• फाइलेरिया संक्रमण के नियन्त्रण की प्रमुख औषधि डाइ – एथाइल कार्बोमैंजीन साइट्रेट है , जिसका उपयोग कर नियन्त्रित किया जा सकता है । यह औषधि कृमियों को अशक्त कर देती है ।

• फाइलेरिया ग्रस्त इलाकों में डाइ – एथाइल कार्बोमैजीन साइट्रेट युक्त नमक का रोजाना उपयोग कर ऐसी बीमारी से बचा जा सकता है ।

• यह बीमारी मच्छरों के काटने से फैलती है , इसलिए निवास क्षेत्रों में कीटनाशकों का उपयोग किया जाना चाहिए ।
• निवास क्षेत्रों के आस – पास में साफ – सफाई का उचित प्रबन्धन ऐसे परजीवी पर नियन्त्रणकारी होते हैं ।
• जलीय खरपतवार को बारिश के मौसम में भौतिक , रासायनिक तथा जैविक तरीकों से नष्ट कर इस बीमारी के प्रभाव से बचा जा सकता है ।

• एजोला पिन्नोटा का उपयोग मच्छरों की वृद्धि के रोकथाम हेतु किया जाना चाहिए ।
• मच्छरों से बचने हेतु घरों में मच्छरदानी तथा मच्छर रोधी क्रीम का उपयोग किया जाना चाहिए ।

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प्रश्न 42. मलेरिया रोग फैलने के कारण , लक्षण , बचने के उपाय एवं उपचार लिखिए ।
अथवा मलेरिया किस मच्छर से फैलता है ? कोई चार लक्षण लिखिए ।
अथवा मलेरिया रोग के कारण , लक्षण व रोकथाम के उपाय लिखिए ।
अथवा टिप्पणी लिखिए – मलेरिया रोग के कारण व लक्षण ।
उत्तर – मलेरिया मलेरिया मच्छर द्वारा फैलने वाला संक्रामक रोग है । गर्म देशों तथा नमी वाले क्षेत्रों में इसका प्रकोप अधिक होता है ।
कारण
मलेरिया का कारण प्लाज्मोडियम नामक परजीवी प्रोटोजोआ है । प्लाज्मोडियम की विभिन्न जातियाँ ( वाइवैक्स , मेलिरिआई और फैल्सीपेरम ) विभिन्न प्रकार के मलेरिया के लिए उत्तरदायी हैं । इनमें से प्लाज्मोडियम फैल्सीपेरम द्वारा होने वाला रोग सबसे गम्भीर है और यह घातक भी हो सकता है । यह रोगवाहक मादा ऐनाफ्लीज मच्छर के काटने से होता है , जो मनुष्य का खून चूसती है । जब मादा ऐनाफ्लीज मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटती है , तब परजीवी उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और आगे का परिवर्धन वहाँ होता है । ये परजीवी मच्छर में बहुसंख्यात्मक रूप से बढ़ते रहते हैं और जीवाणुज ( स्पोरोजाइट्स ) बन जाते हैं । जीवाणुज , परजीवी का संक्रामक रूप है । जब मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है , तो जीवाणुज मच्छर की लार ग्रन्थियों से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है । प्रारम्भ में परजीवी यकृत में अपनी संख्या बढ़ाते रहते हैं और फिर लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं । विभिन्न जाति के परजीवी , मनुष्य के यकृत तथा रक्त में भिन्न – भिन्न जीवन चक्र चलाते हैं । ये चक्र 24 , 48 तथा 72 घण्टों में समाप्त होते हैं । इन्हीं के अनुसार रोग भी कई रूपों में होता है ।
लक्षण
जब परजीवी लाल रुधिर कणिकाओं पर आक्रमण करते हैं , तो लाल रक्त कणिकाओं के फटने के साथ ही एक टॉक्सिक पदार्थ हीमोजोइन निकलता है , जो ठिठुरन एवं प्रत्येक तीन से चार दिन के अन्तराल पर आने वाले तीव्र ज्वर के लिए उत्तरदायी होता है । सिरदर्द , मिचली , पेशीय वेदना तथा तीव्र ज्वर मलेरिया के प्रमुख लक्षण हैं । मलेरिया के प्रत्येक आक्रमण के तीन चरण होते हैं

1. शीत चरण – सर्दी तथा कपकपी महसूस होती है।

2. उष्ण चरण – तीव्र ज्वर , हृदय की धड़कन तथा श्वास की गति में वृद्धि होती है ।
3. स्वेदन चरण – पसीना आता है तथा ताप ज्वर सामान्य स्तर तक कम हो जाता है । मलेरिया के प्रकोप से मुक्त होने के बाद व्यक्ति कमजोर हो जाता है। रुधिर की कमी हो जाती है । यकृत तथा प्लीहा का बढ़ जाना मलेरिया के अन्य प्रभाव हैं ।

बचाव अथवा रोकथाम के उपाय –

मलेरिया मच्छर के काटने से संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति तक फैलता है , इसलिए मच्छर के काटने से बचाव ही मलेरिया की रोकथाम का एकमात्र उपाय है । इसके लिए कुछ उपाय निम्नलिखित हैं –
1. खिड़की व दरवाजों पर महीन जाली लगवाएँ , जिससे घरों में मच्छरों का प्रवेश रोका जा सके ।
2. मच्छर भगाने या मारने वाले रसायन का प्रयोग किया जा सकता है ।
3. मच्छरदानी में सोएँ ।
4. ठहरे हुए पानी पर मिट्टी के तेल का छिड़काव करना चाहिए ,
5. कीटनाशक दवाओं के छिड़काव से मच्छरों को मारना ।
6. मच्छरों के प्रजनन स्थानों को नष्ट करना ।

प्रश्न 44. हैजा रोग के उद्गम , फैलने की विधि , लक्षण एवं उपचार लिखिए ।
अथवा हैजा रोग के कारण , लक्षण व बचने के उपाय लिखिए ।
उत्तर – हैजा- यह एक अति तीव्र संक्रामक रोग है , जो प्रायः भीड़ वाले स्थानों ; जैसे – मेला , तीर्थस्थान आदि में अथवा बाढ़ जैसी आपदा के उपरान्त फैलता है । कभी – कभी तो यह महामारी का रूप लेकर बहुत बड़े जन – समुदाय में फैल जाता है ।
कारण
विब्रिओ कॉलेरी नामक जीवाणु इस रोग का कारक है । ये जीवाणु पानी में अधिक पनपते हैं तथा अधिक गर्मी व अधिक ठण्ड में जीवित नहीं रह पाते । यह मुख्य रूप से मक्खियों द्वारा होता है । मक्खी के मल , वमन आदि पर बैठने से रोगाणु उनके साथ चिपककर हमारे भोज्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं। ऐसे भोजन को ग्रहण करने से रोग का संक्रमण होता है । स्पष्टतः स्वच्छता में कमी से यह रोग बहुत तेजी से फैलता है । इस रोग का उद्भवन काल बहुत कम होता है । संक्रमण के पश्चात् कुछ ही घण्टों में यह बड़ा रूप धारण कर लेता है
लक्षण
रोग के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं –
1. जलीय दस्त जो सामान्तया वेदनामुक्त होता है । 2. हैजे के रोगी को ( उल्टी ) होती रहती है ।
3. चेहरे की चमक खत्म हो जाती है तथा
4. आँखें अन्दर धंस जाती हैं ।
5.समय पर उपचार न मिलने से रोगी की मृत्यु भी हो सकती है ।
बचाव के उपाय
हैजे से बचने के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं –
1. हैजे के टीके द्वारा प्रतिरक्षीकरण आवश्यक है , इसकी एक खुराक का प्रभाव लगभग छ : माह तक रहता है ।
2. हैजा प्रभावित क्षेत्रों में उबले हुए जल का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है ।
3. भोजन ठीक से पका हुआ एवं शुद्ध होना चाहिए 4. बाजार में उपलब्ध कटे हुए फल अथवा बिना ढकी मिठाइयों आदि का सेवन नहीं करना चाहिए 5 . हैजा प्रभावित क्षेत्रों में तालाब , नदी तथा कुएँ के पानी को नि : संक्रमित किया जाना चाहिए ।
6. व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक स्वच्छता के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए , जो हैजा से बचाव के लिए आवश्यक है ।
7.रोगी के मल – मूत्र , वमन तथा थूक आदि के निस्तारण की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए ।
8. हैजे का प्रकोप बढ़ने पर भीड़ – भाड़ वाले स्थानों में जाने से बचना चाहिए ।
उपचार
अनुभवी चिकित्सक की सलाह के साथ निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं
1. प्रारम्भिक अवस्था में रोगी को प्याज का ( रस ) तथा अमृतधारा जैसी दवा दी जा सकती है ।
2. रोगी को पर्याप्त आराम मिलना चाहिए ।
3. निर्जलीकरण से बचने के उपाय करने चाहिए ।

4. रोगी को ठोस भोज्य पदार्थ नहीं देना चाहिए । थोड़ा आराम होने पर सन्तरे का रस , जौ का पानी तथा थोड़ा पानी मिलाकर गाय का दूध दिया जा सकता है ।

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